खों जाने का जूनून जाने क्यों इस कदर भरा हैं मुझ में
यूँही निकल जाता हूँ अनजानी सी राहों में
कुछ अजनबी से चहरे यार बन जाते हैं
एक अपनापन दिखता हैं उन सब की निगाहों में
उनका गम मिटने को कुछ हँसी तोड़ लाता हूँ
और ख़ुशी फैलता हूँ मैं उनकी फिजाओ में
ये सफ़र हैं चार कदमो का,अमित यह इल्म हैं मुझे
जिंदादिली से जीता हूँ अपनी ही अदाओ में
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