लोभ ही ना रहा इस तख्त ओ ताज का मुझे,
मैंने तो केवल दिलों पर राज करना सीखा है।
कभी कमी न रखी तेरी ख्वाहिशों को पूरा करने में,
मैंने तो केवल खुद को मोहताज करना सीखा हैं।
वो कहते हैं मुझे, तुम तो हुकुम ही नहीं चलाते हो,
उन्हें क्या पता मैने बस काम काज करना सीखा हैं।
हर झगड़े को जैसे तैसे अंजाम तक पहुंचाया था मेने,
फिर क्यों तुमने नई बहस का आगाज़ करना सीखा हैं।
तुम्हे तो हर हाल में खुश रखा था न मैने,बोलो ना,
फिर क्यों तुमने हर वक्त मुझे नाराज़ करना सीखा हैं।
.... अमिदित्या