Sunday, 11 October 2015

हुज़ूर,,,,,


हुज़ूर................

हुज़ूर इन गुज़रते हुए लम्हों में तकरार ना ले चलो
हुज़ूर अपने साथ ग़मों का बाजार ना ले चलो
बड़ी मुश्किल से मिलते हैं  दिल यहाँ
हुज़ूर किसी का टुटा हुआ ऐतबार  ना ले चलो

बहुत हसीन हैं दिलो के मेले मेरे गावों में
हुज़ूर वहां इस जहाँ का बाजार ना ले चलो

कभी कभी ही ठीक होता हैं आँखों में आँसू आना
हुज़ूर अब तुम इन्हें हर बार ना ले चलो

अरे बहुत कुछ छपता हैं इन अखबारों में यहाँ
हुज़ूर दिलो को दुखाने वाले वो समाचार ना ले चलो

पहले ही बहुत क़त्ल हुए हैं इन अदाओ से मेरे यार
हुज़ूर अब की बार ये हथियार ना ले चलो

हमें पता होता हैं के कौन तोड़ता  हैं दिलों को  यहाँ
हुज़ूर दर्द--दिल के जिंम्मेदार को ना ले चलो

बहुत लूटा हैं उन हुक्मरानो ने मेरे जहाँ  को
हुज़ूर मेरे गाओं में उन जमींदार को ना ले चलो

मुमकिन हैं  तन्हा ही पूरा करना होगा ये सफर यहाँ
हुज़ूर अपने साथ ये घरबार ना ले चलो

माना की बड़ी गज़ब हैं इस नयी दुनिया की दौड़
हुज़ूर मेरे गावों में वो रफ़्तार ना ले चलो



Tuesday, 18 August 2015

उन्होंने आँखों में इशारें सजा रखे हैं
तो हमने भी दिलो में चिराग़े जला रखे हैं
वो सोचते है के आजायेंगे उनके चंगुल में
वो क्या जाने हमने भी यहाँ पिंजरे लगा रखे हैं
                                           .......अमिदित्या

Monday, 23 February 2015

सैलाब-ऐ-मुहब्बत

मैंने सैलाब-ऐ-मुहब्बत में अक्सर यही पाया हैं
हर जगह मिलते हों वो, जिसने दिल गवाया हैं
अटके हैं अभी भी जाने कितने ही इस मज़धार में
निकला वही हे जिसने, हाल-ऐ-दिल फ़रमाया हैं
ये तो तूफान हैं समंदर का दोस्तों, आसान नहीं होगा
बचा वही हैं जिसने होसला दिखाया हैं.
                                             अमिदित्या.......