Wednesday, 24 October 2012
विजयादशमी की बधाइयाँ
अन्याय का दंश ये
चाहे जितना चढ़ जाये
श्री राम उसके अंत को
हर बार ही आ जाये
अंधकार मेरे मन का
मिटने लगा जो सूरज चढ़ा
तेज दिव्य प्रकाश में
मन प्रफुल्लित हो जाये
ये प्रकाश ज्ञान का
जो मेरे मन में हैं छुपा
तेरे मन को दे सकू
तो जीवन सफल हो जाये
अमित और आह अब नहीं
ना हो गलत हो सब सही
ये प्रार्थना मेरी राम जी
आप तक पहुँच जाये
विजयादशमी की बधाइयाँ
Thursday, 18 October 2012
ये दुनिया मेरे वजूद का क्या कर पाएगी??????
ये कशमकश तो मेरे साथ ही जाएगी,
अमित ये दुनिया मेरे वजूद का क्या कर पाएगी.
क्या वो मेरे नाम का कोई मकबरा या ईमारत बनवाएगी ,
या मुझे दफन कर मुझे भूल जाएगी.
क्या वो मेरे अल्फाज़ो को किताबो में छापवाएगी ,
या मेरे लिखे पन्नो की राख किसी नाले में बहाएगी .
क्या वो मेरा पुतला किसी संग्रहालय में रखवाएगी,
या मेरी तस्वीर को चन्दन तिलक भी न लगा पाएगी.
पर इन सवालो पर मैं हैरान क्यों हो जाता हूँ,
अमित ये दुनिया मुझे जैसा पाएगी, वैसा ही मुझे लौटाएगी.
बस अब कुछ एसा कर गुज़रू की दुनिया मेरी शक्सियत को पहचान जाए,
अमित मेरे वजूद के बदोलत मुझे आसमान पर बैठाये....
Thursday, 11 October 2012
DIL SE...
कल होगा संघर्ष नया
तो क्या ये रात खोने ना दूं
कल की चिंता से डर कर
क्या फिर सुबह होने ना दूं
माना कठिन हैं इस जीवन में
सारे सपने पूरे होना
इस बात से भयभीत हो
क्या सपनो को जीने ना दूं
अटल अडिग साहस ले
मैं निर्भय खड़ा सदा
तो फिर व्यर्थ विचार ले
क्यों खुद को उठने ना दूं
Subscribe to:
Comments (Atom)

