ये कशमकश तो मेरे साथ ही जाएगी,
अमित ये दुनिया मेरे वजूद का क्या कर पाएगी.
क्या वो मेरे नाम का कोई मकबरा या ईमारत बनवाएगी ,
या मुझे दफन कर मुझे भूल जाएगी.
क्या वो मेरे अल्फाज़ो को किताबो में छापवाएगी ,
या मेरे लिखे पन्नो की राख किसी नाले में बहाएगी .
क्या वो मेरा पुतला किसी संग्रहालय में रखवाएगी,
या मेरी तस्वीर को चन्दन तिलक भी न लगा पाएगी.
पर इन सवालो पर मैं हैरान क्यों हो जाता हूँ,
अमित ये दुनिया मुझे जैसा पाएगी, वैसा ही मुझे लौटाएगी.
बस अब कुछ एसा कर गुज़रू की दुनिया मेरी शक्सियत को पहचान जाए,
अमित मेरे वजूद के बदोलत मुझे आसमान पर बैठाये....
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