वो खामोश सी नज़रे मेरी और क्यों है, मेरे अन्दर धडकनों का शोर क्यों है,
गर ये एहसास-ए-मुहब्बत है मेरे दिल में उसके लिए, तो अमित इंतजार-ए-इकरार अब और क्यों है.
नंगे पैरों पर चलने सा हैं ये गर्म रेगिस्तान में,
पर ना चला तो क्या जिया है इस जहान में
गर लड़खड़ा कर गिरा भी तो आगे बढूँगा रेंग कर,
अमित मेरी कब्र भी ना रुक पायेगी किसी एक कब्रिस्तान में