इस क्षणिक विग्रह में,
क्यों मन विचलित करती हो,
मैं सदा तुम्हारे करीब ही हूं ,
इस बात का यकीन तो करो ।
तुम्हारे दमकते फोन में,
तुम्हारे हाथो के त्रिकोण में,
सभी एकांतो के मौन में,
मैं सदा तुम्हारे करीब हूं।
तुम्हारी आलसी सहर में,
तुम्हारी हर इक दोपहर में,
एक्टिवा के सफर में,
मैं सदा तुम्हारे करीब हूं।
तुम्हारी परिधि के सृजन में,
मन में आए किसी भजन में,
और पेट से झांकते वजन में,
मैं सदा तुम्हारे करीब हूं।
तुम्हारी हर रात में,
अनकही हर बात में,
उलझते सुलझते जस्बात में,
मैं सदा तुम्हारे करीब हूं।
इन चादरों की सिलवटों में,
तुम्हारी बदलती करवटो में,
तुम्हारी सभी हरकतों में,
मैं सदा तुम्हारे करीब हूं।
.....अमिदित्या