लेने को दूध और थोड़ी सब्ज़ी,
मैं भाग रहा था बस पकड़ने,
जो जा रही थी सुपरमार्केट तक,
उसी बस पकड़ने को,
साथ मेरे ही भाग रही थी,
अस्सी वर्षीय बूढ़ी दादी भी,
लड़खड़ाते कदम,
कांपते हाथ,
हाफती सांसे,
धुजनी भरी आवाज़,
शायद वह भी लेना चाहती होगी,
कुछ खाने कुछ पीने का सामान,
यूरोपियन परिवारों के,
बाकी बुजुर्गों की तरह,
वह भी जानती होगी,
कोई नही हैं घर में उसके,
जो लाकर दे दे,
दो वक्त की ब्रेड,
थोड़े से फल,
सलाद की भाजी,
और पीने का पानी,
वह भी जानती होगी,
के छूट गई ये बस तो,
भूखा रहना होगा,
क्योंकि रविवार को यहां,
सब कुछ बंद जो रहता है,
वह जानती होगी,
उसकी मां ने भी,
यही सब झेला होगा,
वह जानती होगी,
उसे भी ये झेलना हैं।
........अमिदित्या
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