Monday, 23 February 2015

सैलाब-ऐ-मुहब्बत

मैंने सैलाब-ऐ-मुहब्बत में अक्सर यही पाया हैं
हर जगह मिलते हों वो, जिसने दिल गवाया हैं
अटके हैं अभी भी जाने कितने ही इस मज़धार में
निकला वही हे जिसने, हाल-ऐ-दिल फ़रमाया हैं
ये तो तूफान हैं समंदर का दोस्तों, आसान नहीं होगा
बचा वही हैं जिसने होसला दिखाया हैं.
                                             अमिदित्या.......