मेरे हालत कुछ इसे हैं अब, अपने ही शहर में अजनबी हूँ मैं.
यु तो दिखते हैं जाने पहचाने कई, पर इनमे से अपना कौन हैं.
तस्वीर सा हो गया हैं ज़माना सारा, सब देखते हैं मुस्कुराकर ज़ख्म मेरे,
इसे बुज़दिली कहू या बेपरवाही उनकी, सब देख कर भी कहता कौन हैं.
हिम्मत बढ़ाते थे जो हाथ कभी , अब दूर से ही जुड़े हुए हैं,
इन तकलीफों के साये में मेरे पास आता कौन हैं
कुछ ना कर सका तू अब तक, ये कह कर महबूब भी दूर हो गया मुझसे,
नाकारा सी ज़िन्दगी में आज कल, मुझसे दिल लगता कौन हैं.
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