ठहरी हुई थी मुद्दत से जो बात, जुबां पर आती भी तो कैसे,
मैं अपना हाल-ए-दिल, तुम्हें बताती भी तो कैसे
बस गया था निगाहों में तेरा जो चेहरा,
वो किसी और को दिखाती भी तो कैसे,
तू टकराता रहा मेरी राहों में, मुझसे अक्सर,
पर मैं तेरी राहों में तुझसे टकराती भी तो कैसे,
तुझे तन्हा खड़ा देखा, फिर भी तुझ तक आ न पाई,
मैं अपनी तन्हाइयों से लड़ पाती भी तो कैसे,
बहुत कोशिशों बाद, कुछ अक्षर जोड़ें तो थे मैंने,
पर उन शब्दों को बयान कर पाती भी तो कैसे,
वादा किया था खुद से, के करीब आकर बताऊंगी तुझे सब कुछ,
पर दूरियां ही इतनी थी, कि वादा निभाती भी तो कैसे,
ठहरी हुई थी मुद्दत से जो बात, जुबां पर आती भी तो कैसे,
मैं अपना हाल-ए-दिल, तुम्हें बताती भी तो कैसे ।
अमिदित्या.....
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