पहले अक्सर रोशनी चली जाया करती थी
नियमित छह से आठ,
उस अंधेरे से उदासी थी कम
खुशियाँ थी ज्यादा
किताबें बंद कर भाग उठते
ओटले पे सब इकठ्ठे हो जाते
रोज़ नए खेल शुरु हो जाते
कभी अंताक्षरी, कभी ताश
कभी कुछ ना दिखने पर भी क्रिकेट
मम्मी चाची सब आते बाहर
और गुफ़्तगू भी शुरू
हमारी जमघट देख पड़ोसी भी
खुद को रोक ना पाते
इतने मज़े करते के उस अंधेरे मे भी
सुकून मिलता था
अब रोशनी नहीं जाती
अब किताबें खुली ही रहती हैं
ओटले तो हैं ही नहीं
अब कोई इकट्ठा नहीं होता
ना कोई अंताक्षरी
ना कोई ताश
और ना कोई क्रिकेट
ना वो जमघट रही
ना वेसे पड़ोसी रहे
अब इस उजाले मे भी सुकून नहीं
और कभी रोशनी चली भी जाए तो
मोबाइल की रोशनी से चहरे चमक उठते हैं
अब कभी वैसी रोशनी नहीं जाती
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