Tuesday, 13 March 2012



शांत ताल सी स्थिरता, मन क्यों न पा रहा.
ये विचलित ज्वार सा, उठा चारो और क्यों.

यूँ तो हूँ एकांत में, पर क्यों लगे की भीड़ हैं.
शमशान सी ख़ामोशी में, उठ रहा ये शोर क्यों.

गतिमान हर आदमी, वेग हर क्षण बड़ रहा.
उस ओर जो दुनिया भागती, शून्य स्थिर मैं इस ओर क्यों.

जिसे जब जरुरत रही, मुझसे वो जुड़ता गया.
मतलबी इस दौर में , तलाश-ऐ-बेमतलबी अब और क्यों.

मिलन का सपना दिखा कर , छोड़ा मुझे तन्हा यहाँ.
वेदना वियोग में, मैं जल रहा इस छोर क्यों.

ये जहान कुसूरवार हैं, या कुसूरवार मैं ही हूँ
धोखा मिले हर मोड़ पर, तो अमित भरोसा अब और क्यों.


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