Thursday, 28 May 2020

वर्षगाँठ पाँच

हाथ मे हाथ थामे 
निकल पड़े थे दोनों 
ना सफ़र का पता 
ना डगर का 
ना कश्ती का पता 
ना किनारे का 
हौसला था बस 
एक दूजे का साथ देने का 
हाथ थामे रहने का 
एहसास था बस 
बिन  बोले सब कुछ सुनने का 
बिन कहे सब कुछ समझने का 

कहा से आया ये हौसला 
नहीं पता 
बस यही पता
के वो रहेगा हमेशा 
हर लम्हा, हर दिन, हर साल 
जैसे पांच सालों से हैं 
और रहेगा आखिरी सासों तक 


No comments:

Post a Comment