निकल पड़े थे दोनों
ना सफ़र का पता
ना डगर का
ना कश्ती का पता
ना किनारे का
हौसला था बस
एक दूजे का साथ देने का
हाथ थामे रहने का
एहसास था बस
बिन बोले सब कुछ सुनने का
बिन कहे सब कुछ समझने का
कहा से आया ये हौसला
नहीं पता
बस यही पता
के वो रहेगा हमेशा
हर लम्हा, हर दिन, हर साल
जैसे पांच सालों से हैं
और रहेगा आखिरी सासों तक
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