मेरे पास की राह पर वो शख्स मुझे दिखा
कुछ सहमा सा था वो चलते चलते वो रुका
आँखों में उसके मुहब्बत का एक एहसास था
दूर था वो मुझसे पर मैं अब भी उसके पास था
उम्मीद थी उसे की मैं अब कुछ कह भी दूंगा
फिर यह हाथ बड़ा कर मैं उसे रोक लूँगा
चाहत थी उसकी कि लिपट जाए मुझसे और थोडा रो ले ज़रा
समां कर मेरी बाँहों में दो पल ज़िन्दगी जी ले ज़रा
पर अब मुश्किल हैं दिल की तू उसका हो सके
फिर बीते लम्हों की तरहा उसकी बाँहों में खो सके
अब ऐतबार ए मुहब्बत ना हो पाएगा कभी उसपर
ये दिल अब ना खो पाएगा कभी उसपर
गिरा हूँ भले ही सूखे पत्ते की तरहा अमित, ना जुड़ पाउँगा
पर अब तो जल के ही अपना नया जहाँ बसाऊंगा
No comments:
Post a Comment